असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति अब भी बदहाल

nspnews 30-04-2018 Editorial

श्रमिक दिवस पर विशेष (नमिता सिंह)
शिक्षा, साक्षरता बढ़ाने और बाल मजदूरी रोकने के साथ श्रमिको के जीवन स्तर को उठाने के  लिए शासन अरबों रूपये अनेक कार्यक्रमों, योजनओं के माध्यम से पानी की तरह बहाया जा रहा है  बाबजूद  गरीब-मजदूरों के बच्चों को पेट की भूख और बढती जनसंख्या के कारण शिक्षा नहीं मिल पा रही है श्रमिकों का शोषण रूक नही रहा है खासकर आदिवासी भाई-बहिनों की स्थिति अभी बदहाल है।  इतना जरूर है कि श्रम अधिनियम में संशोधन से काफी अपेक्षाएं बंधी हैं। किन्तु अधिनियम को क्रियान्वयन करने वाले जहां मात्र कागजी कार्यवाही की ओपचारिकता कर रहे है।   
बदलते वक्त के साथ श्रमिक-मजदूर की परिभाषा बदल गयी है। एक समय श्रमिक में सिर्फ मजदूरी करने वाले ही आते थे किन्तु अब अनेक क्षेत्रों में कार्य करने वाले श्रमिक के दायरे में आ गये हैं जिसमें निजी क्षेत्र से लेकर सरकारी क्षेत्र में कार्य करने वाले  शिक्षित लोग भी शामिल हैं।  
साल में पडऩे वाले कई विशेष दिवसों की तरह 1 मई को भी श्रमिक-मजदूर दिवस मनाया जाता है औपचारिकता के लिए देश के कई हिस्सों में कार्यक्रम भी होते हैं और कुछ मजदूर हितेषी घोषणा भी होती हैं परन्तु उनका सही क्रियान्वयन कितना होता है यह सर्वविदित है? श्रमिक के रूप में कई श्रेणियां हैं कि इनमें से सबसे दयनीय स्थिति आम मजदूर की है जिसे असंगठित क्षेत्र में गिना जाता है। जबकि सरकारी और संगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले श्रमिकों की स्थिति कुछ बेहतर है। 
मजदूरों के बच्चों की स्थिति भी चिंताजनक है इनके बच्चों को भी शिक्षा ग्रहण करने और खेलकूद के स्थान पर दो वक्त की रोटी का इंतजाम  करने के लिए अपना बचपन खोना पड़ रहा है इस वर्ग की महिलाएं भी कुरीतियों और पुरूष वर्ग में बनी नशे की प्रवृत्ति के कारण शोषण का  शिकार होती रहती हैं। दूसरी और विभिन्न संगठन अपने दिखाकर  अपने स्वार्थाे और किसी राजनैतिक दल के लिए भीड़ जुटाने के  लिए  अक्सर मजदूरों का उपयोग करते रहते हैं।  
  दूसरी और शुद्व रूप से मजदूर वर्ग नशा और कुरीतियों से हटकर जागरूकता और  जबावदारी से कार्य कर योजनाओं के लाभ उठाने के लिए  आगे आए। अन्यथा स्थिति बेहतर होने की कल्फना कल्फना ही रहेगी। मजदूर वर्ग की वास्तविक दयनीय दशा से जनप्रतिनिधि और सरकार  को गहराई से समझना होगा। इसके अलावा मजदूरों की अपनी समस्याऐं हैं कुछ मजबूरियां हैं। जो उनके जीवन स्तर को बढ़ाने में बाधक हैं। 
अवकाश नहीं, 12 घंटे काम 
हमारे देश में बेशक मजदूरों के 8 घंटे काम करने का संबंधित कानून लागू है लेकिन इसका पालन सिर्फ सरकारी कार्यालय ही करते हैं, देश में अधिकतर  निजी क्षेत्रों में  अब भी  12 घंटे तक काम  लिया जाता है और साप्ताहिक अवकाश से वंचित किया जाता है , अवकाश लेने का कोई नियम नही है यहां मनमर्जी से काम लिया जाता है। ऐसे क्षेत्रों में शिक्षित-अशिक्षित सभी शामिल हैं। जिनका निजी क्षेत्रों में शोषण जारी है।  वहीं भारत में 16,154 से अधिक कामगार संगठन हैं, जिनके 92 लाख से अधिक सदस्य हैं। भारत में कुल 50 करोड़ कर्मचारी व मजदूर हैं जिनमें करीब 94 फीसदी असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं। 
मजदूर दिवस का इतिहास
अंतराष्ट्रीय तौर पर मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत 1 मई 1886 को हुई थी। अमेरिका के मजदूर संघों ने मिलकर निश्चय किया कि वे 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेंगे। जिसके लिए हुई  हड़ताल के दौरान शिकागो की हेमार्केट में बम ब्लास्ट हुआ, जिससे निपटने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोली चला दी जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए।  इस घटना के  बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में ऐलान किया गया कि हेमार्केट नरसंघार में मारे गये निर्दाेष लोगों की याद में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा। 
भारत में कब हुई शुरूआत 
भारत में एक मई का दिवस सब से पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को मनाना शुरू किया गया था। उस समय इसको मद्रास दिवस के तौर पर प्रामाणित कर लिया गया था। इस की शुरूआत भारती मज़दूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी।  मद्रास के हाईकोर्ट सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया और एक संकल्प के पास करके यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाये। प्रारंभ में इसे मद्रास दिवस के रूप में मनाया गया।  

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