भारत के उत्तरी और पूर्वाेत्तर भागों में पाए जाने वाले सांपों की एक प्रजाति पोप्स पिट वाइपर का विष कैसे काम करता

एनएसपीन्यूज। एक नए अध्ययन ने इस रहस्य को उजागर किया है कि पोप्स पिट वाइपर, जोकि भारत के उत्तरी और पूर्वोत्तर भागों में पाए जाने वाले सांपों की एक प्रजाति है, का विष कैसे काम करता है। यह अध्ययन विष की विषाक्तता, दवाइयों की प्रगति और उन्नत विषरोधक संरचना (एंटीवेनम कंपोजीशन) की नींव रखने में मदद कर सकता है।
“चार बड़े” विषैले सांपों - रसेल वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर, स्पेक्टेक्ल्ड कोबरा और कॉमन क्रेट - पर काफी शोध किया गया है, लेकिन पोप्स पिट वाइपर (ट्राइमेरेसुरस पोपियोरम), जोकि पूर्वोत्तर भारत के घने जंगलों में पाया जाने वाला एक वृक्षीय रात्रिचर सांप है, के विष की संरचना का अभी तक परीक्षण नहीं किया गया है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उन्नत अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आशीष के. मुखर्जी ने इस मायावी पिट वाइपर के विष की संरचना को स्पष्ट करने के लिए अमृता विश्व विद्यापीठम के प्रोफेसर बी.जी. नायर, डॉ. एम. वनुओपदथ, डॉ. भार्गब कलिता एवं डॉ. अपाररूप पात्रा तथा मिजोरम विश्वविद्यालय के डॉ. एच.टी. लालरेमसंगा के साथ हाल ही में एक अध्ययन किया।
समकालीन लेबल-मुक्त मात्रात्मक प्रोटोमिक्स ने पोप्स पिट वाइपर के विष में 106 प्रोटीन की पहचान की, जिन्हें 12 विष परिवारों में वर्गीकृत किया गया। उल्लेखनीय रूप से, इसके विष का 60 प्रतिशत हिस्सा एंजाइमों से बना होता है जो प्रोटीन को तोड़ते हैं और ऊतकों को नुकसान पहुंचाते हैं, रक्त के थक्के को बाधित करते हैं और स्थानीय रक्तस्राव को प्रेरित करते हैं।
यह अध्ययन विष के उन हानिकारक घटकों की जांच करता है, जोकि अधिकतर विषैले एंजाइम होते हैं और पीड़ित पर उनके हानिकारक प्रभावों को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, सांप के विष मेटालोप्रोटीनेसिस (एसवीएमपी), जोकि पोप्स पिट वाइपर सहित सांपों के वाइपरिडाए परिवार का एक विषैला एंजाइम है, को पीड़ितों में रक्तस्राव, ऊतकों के टूटने और रक्त के थक्के जमने की समस्या पैदा करने के संबंध में प्रदर्शित किया गया है।
इस विष में सेरीन प्रोटीएज (एसवीएसपी) नामक एंजाइम भी होते हैं, जो रक्त के जमने में बाधा डालते हैं, एक विषैला एंजाइम फॉस्फोलिपेज ए2 होता है, जो मांसपेशियों में चोट और सूजन उत्पन्न करता है, तथा एक गैर-एंजाइमी विष स्नैकलेक्स (सांप सी-प्रकार लेक्टिन) होता है, जो रक्त प्लेटलेट की कार्यप्रणाली और रक्त के जमने को प्रभावित करता है।
प्रजाति-विशिष्ट विषरोधकों (एंटीवेनम) का अभाव भारत में सांप के काटने के उपचार को जटिल बनाता है। वाणिज्यिक विषरोधक “चार बड़ी” प्रजातियों के विष का प्रतिकार करते हैं और इस प्रकार पिट वाइपर द्वारा काटे गए रोगियों को इसके परिणामों के प्रति नाजुक बना देते हैं। यह अध्ययन टी. पोपियोरम विष का प्रतिकार करने के लिए व्यापक फलक वाले या क्षेत्र-विशिष्ट विषरोधकों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
पोप्स पिट वाइपर के विष की प्रोटोमिक जटिलता को समझकर, शोधकर्ताओं ने विष की विषाक्तता, दवाइयों की प्रगति और बेहतर विषरोधक संरचनाओं के लिए एक नींव रखी है। चूंकि भारत 2030 तक सांप के काटने से होने वाली मृत्यु दर को 50 प्रतिशत तक कम करने का प्रयास कर रहा है, ऐसे नवीन शोध से विष के अध्ययन को जीवन रक्षक चिकित्सीय उपचार में बदलने में मदद मिलेगी। यह अध्ययन हाल ही में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोमोलेक्यूल्स में प्रकाशित हुआ था।
